मारुति और दुनिया के मजदूर एक हो-2

मारुति के आंदोलन को फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान यहां तक कि खुद पाकिस्तान के मजदूरों ने भी समर्थन दिया। भारतीय दूतावासों के सामने इन मजदूरों ने अपनी भाषाओं और अंग्रेजी में ‘दुनिया के मजदूरो एक हो’, ‘मारुति के मजदूरों के न्यायपूर्ण संघर्ष का साथ दो’ आदि नारे लगाए। यह सब वर्ग चेतन मजदूर थे। वे वर्ग चेतन मजदूर जो आज भी खुद अमेरिका, चीन, रूस, फलस्तीन, इजरायल के देशों में भी हैं। लेकिन अल्पसंख्या में हैं।

उनकी संशोधनवादी पार्टियां पूंजीवाद की डोली के कहार बने बैठी हैं। जैसे अमेरिका की यूनाइटेड ऑटो वर्कर्स यूनियन जो निस्संदेह जासूसी करने के लिए मारुति मजदूर आंदोलन को समर्थन देने के बहाने दिल्ली आई थी। जब पाकिस्तान के कराची से भी क्रांतिकारी मजदूर भारत आए थे।

कहिए तो पाकिस्तान के मजदूर भारत के मजदूरों के दुश्मन हैं या दोस्त? और हमारी भाजपा, कांग्रेस आदि तमाम पूंजीवादी सरकारें क्या हमारे मज़दूरों की दोस्त हैं? नहीं, कतई नहीं।

दुनिया का दरोगा बनने वाला अमेरिका आज गिनती के कुछ लोगों का अमेरिका है। अमेरिका में पिछले दशकों में मात्र 19 लोगों की संपत्ति में कई कई गुना वृद्धि हुई है जबकि अमेरिका मध्य वर्ग करोड़ों की संख्या में सड़कों पर बेघर है। अमेरिका के मध्य वर्ग तक को स्वास्थ्य बीमा के लिए तीन-तीन कंपनियों में करना पड़ता है। अमेरिका में शिक्षा का कर्ज इतना ज्यादा है कि युवतियां वेश्यावृत्ति तक करने को मजबूर हैं।

हडसन नदी पर विमान उतार कर सैकड़ो यात्रियों की जान बचाने वाले पायलट तक को अमेरिका में गरीबों को प्रदत्त फूड स्टंप्स पर गुजारा करना पड़ता है। ऐसे में उनका मारुति के मजदूरों को समर्थन देना समझ में आता है। दुनिया भर में जो आज हम युद्ध देख रहे हैं वह लॉकहीड मार्टिन, बोइंग जैसी गिनती की हथियार निर्माता कंपनियों का मुनाफाखोर युद्ध है।

मशहूर अमेरिकी डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर माइकल मूर की फिल्म ” केपीटलज्म ए लव स्टोरी ” दर्शनीय है और अमेरिका के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बनी फिल्म “सीको” में अमेरिकी मध्यवर्ग के स्वास्थ्य की दुर्दशा दिखाई गई है। साथ ही सत्तर साल से अमेरिका के प्रतिबंध झेल रहे क्यूबा जैसे देश भी दिखाई दिए गए हैं ।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका में 9/11 के बाद स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को अमेरिका में इलाज नहीं मिला बल्कि उनका इलाज क्यूबा में किया गया बिल्कुल मुफ्त। जबकि तब इन स्वास्थ्य कर्मियों को अमेरिका का हीरो बताया गया था। इन्हें अमेरिकी संसद में सम्मानित किया गया था।

याद कीजिए लेनिन ने कहा था कि ” पूंजीवादी लोकतंत्र सामंतवाद की तुलना में एक महान ऐतिहासिक प्रगति है, परंतु यह अत्यंत ही पाखंड पूर्ण संस्था है जो अमीरों के लिए स्वर्ग और गरीबों के लिए एक जाल और छलावे के सिवाय कुछ नहीं है।”

वापस मारुति पर।

करीब 20 वर्ष पूर्व गुड़गांव के कोर्ट में मारुति की यूनियन के नेता से पूछा गया था कि आप तो दक्षिण भारतीय हैं और मारुति उत्तर भारत में है तो आपका आप यहां पर उनकी यूनियन के अध्यक्ष क्यों हैं ? 

एक जज ने टिप्पणी की थी कि ,” अगर मारुति के मजदूरों को जमानत दे दी तो विदेशी पूंजी निवेश प्रभावित होगा “

पिछले अंक में बताया जा चुका है कि हरियाणा की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के वकील केटीएस तुलसी को 9 करोड़ रुपए मारुति मजदूरों के खिलाफ केस लड़ने के लिए दिए गए। हमारे, आपके टैक्स के पैसे। भाजपा ने सत्ता में आने पर इस मामले की जांच करने का भरोसा दिया था लेकिन वह भाजपा कैसे इस केस की जांच कर सकती है जिसका प्रधानमंत्री (तब गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में खुद मारुति को) गुजरात में आमंत्रित करता है और 70 सालों से रह रहे आदिवासी गुजराती लोगों को वहां से विस्थापित होना पड़ता है। 

आज 14 साल बाद भी भारत भर के वर्ग चेतन मजदूरों के लिए मारुति को समर्थन देना जरूरी है। ताकि वहां के गैर कानूनी रूप से निकाले गए ढाई हजार मजदूरों के परिवारों की मदद हो सके।

क्योंकि खुद मारुति के जनरल मैनेजर का बयान है कि हम दुनिया के पूंजीपति वर्ग के बतौर एक हैं, यही बात बिल गेट्स ने या किसी अमेरीकी पूंजीपति ने कही थी। मारुति की कहानी के बारे में ज़्यादा जानना हो तो आपको पीयूडीआर की वेबसाइट में अंग्रेजी और हिंदी में लिखी गई दर्जन भर रिपोर्ट्स मिल जाएगी। उनकी प्रिंटेड कॉपी भी मामूली भुगतान पर प्राप्त की जा सकती हैं।

 दुनिया के मजदूर एक हो।

(डॉ उमेश चंदोला के लेख का दूसरा और अंतिम भाग)

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